देहरादून : 18 सितम्बर, 2026 को उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच दिल्ली के तत्ववाधान में मंच के संयोजक दिनेश ध्यानी व युवा कवि, भाषाविद अशीष सुंदरियाल द्वारा उत्तराखंड की प्रमुख आंचलिक भाषाओं- गढ़वाली-कुमाउंनी के संरक्षण-संवर्धन के संदर्भ में उत्तराखण्ड के भाषा मंत्री खजानदास को उनके रेसकोर्स देहरादून आवास में उन्हें एक ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें कहा गया है कि गढ़‌वाली, कुमाउनी भाषाएँ वर्षों पुरानी है एवं इनमें हर विधा में साहित्य सृजन हो रहा है। इतिहास में ये भाषाएँ राजकाज की भाषाएँ रही हैं।

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उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद भी राज्य की इन प्रमुख आंचलिक भाषाओं पर सरकारी स्तर पर अभी तक उचित ध्यान नहीं दिया गया है। अतःआपसे अनुरोध है कि, गढ़वाली एवं कुमाउंनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने हेतु उत्तराखण्ड विधान‌स‌भा से प्रस्ताव पास करके गृह मंत्रालय, भारत सरकार को भेजा जाए । साथ ही उत्तराखंड में अन्य भाषाओं यथा हिंदी, पंजाबी, उर्दू एवं संस्कृत की भाँति ही गढ़वाली एवं कुमाउंनी अकादमी का गठन किया जाए ।

इसके अतिरिक्त भारतीय संविधान के अनुच्छेद 345 के अनुरूप गढ़वाली एवं कुमाउंनी भाषाओं को राज्य स्तर पर मान्यता प्रदान की जाए। ताकि प्रदेश में गढ़वाली कुमाऊनी भाषाओं को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सके। ज्ञातव्य हो कि उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच दिल्ली लगातार गढ़वाली व कुमाऊनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने हेतु लगातार प्रयास कर रहा है व दिल्ली एनसीआर समेत उत्तराखण्ड में भी भाषा शिक्षण कक्षाओं का आयोजन करता आ रहा है।

भाषा मंत्री खजानदास ने कहा कि सरकार उक्त मांगों पर लगातार सकारात्मक रूप से विचार कर रही है। अकादमी के गठन पर भी सरकार शीघ्र निर्णय लेगी। अशीष सुंदरियाल द्वारा चिट्ठी पत्री वार्षिक पत्रिका मंत्री जी को भेंट की साथ ही दिनेश ध्यानी ने भी अपनी सद्य प्रकाशित गढ़वाली कथा संग्रह बगत भी भेंट की।

मंत्री जी ने कहा कि हमारी भाषाओं में अपार संभावनाएं हैं। आप जैसे लोगों के प्रयास से ही ऐसी उत्कृष्ट पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है। भविष्य में सरकार हमारी लोक-भाषाओं पर आगे बढ़कर काम करेगी।