कर्णप्रयाग: उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। चमोली जिले के सिमली (कर्णप्रयाग) बेस अस्पताल को पूर्ण रूप से संचालित करने और इसका आधिकारिक शासनादेश जारी करने की मांग को लेकर ग्रामीणों का सब्र का बांध टूट चुका है। अपनी जायज मांगों को लेकर करीब 250 किलोमीटर की बेहद कठिन पैदल यात्रा तय कर चमोली के ग्रामीण राजधानी देहरादून पहुंच चुके हैं, जहां उन्होंने सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन शुरू कर दिया है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!पारंपरिक ढोल-दमाऊं के साथ 10 दिन की पदयात्रा
‘सिमली बेस अस्पताल संघर्ष समिति’ के बैनर तले चमोली के 50 से अधिक गांवों के ग्रामीण 11 अक्टूबर 2026 को कर्णप्रयाग के मां चंडिका देवी मंदिर में पूजा-अर्चना कर निकले थे। पहाड़ की माताओं, बहनों और बुजुर्गों ने धूप, बारिश और खराब रास्तों की परवाह किए बिना पारंपरिक वाद्य यंत्रों (ढोल-दमाऊं) के साथ 10 दिनों तक लगातार पैदल सफर किया और 21 अक्टूबर को देहरादून में दस्तक दी।
बैरिकेडिंग पर पुलिस से तीखी नोकझोंक, गांधी पार्क पर धरना शुरू
देहरादून पहुंचते ही जब आक्रोशित प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच करने का प्रयास किया, तो भारी पुलिस बल ने उन्हें गांधी पार्क के पास बैरिकेडिंग लगाकर रोक दिया। इस दौरान पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच तीखी नोकझोंक भी हुई। सरकार द्वारा कोई ठोस आश्वासन न मिलने से नाराज ग्रामीण अब गांधी पार्क के पास ही धरने पर बैठ गए हैं और उन्होंने उग्र आंदोलन के साथ भूख हड़ताल शुरू करने की चेतावनी दी है।
क्या है आंदोलन की मुख्य वजह? (विवाद और मांगें)
अस्पताल से जुड़ी मुख्य समस्याओं और ग्रामीणों की मांगों को इस प्रकार समझा जा सकता है:
| मुख्य पहलू | वर्तमान स्थिति और विवाद |
|---|---|
| कागजी घोषणा बनाम धरातल | ग्रामीणों का कहना है कि 9 नवंबर 2024 को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे ₹35 करोड़ की लागत से पूर्ण बेस अस्पताल बनाने की घोषणा की थी, लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी सरकार ने इसका लिखित शासनादेश (GO) जारी नहीं किया है। |
| सिर्फ ‘रेफरल सेंटर’ बना अस्पताल | 100 बेड के इस आलीशान अस्पताल में वर्तमान में सिर्फ दो डॉक्टर तैनात हैं। डॉक्टरों, विशेषज्ञों और अल्ट्रासाउंड जैसी बुनियादी मशीनों की कमी के कारण यह अस्पताल महज एक ‘रेफरल सेंटर’ बनकर रह गया है, जहां से मरीजों को सीधे श्रीनगर या ऋषिकेश भेज दिया जाता है। |
| रास्ते में टूटती सांसें | आंदोलन में शामिल महिलाओं ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि चमोली से ऋषिकेश या देहरादून लाते समय कई गर्भवती महिलाएं और गंभीर मरीज खराब रास्तों और मलबे के कारण एम्बुलेंस में ही दम तोड़ देते हैं। इस वर्ष भी इलाज के अभाव में क्षेत्र की दो गर्भवती महिलाओं की मौत हो चुकी है। |
‘बेस अस्पताल नहीं तो वोट नहीं’ – 2027 चुनाव बहिष्कार का एलान
आंदोलनकारियों का गुस्सा इस बात पर है कि सरकार पहाड़ की जनता की जान के साथ खिलवाड़ कर रही है। ग्रामीणों ने दो-टूक शब्दों में नारा दिया है—“बेस अस्पताल नहीं तो वोट नहीं”। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने तुरंत लिखित शासनादेश जारी कर डॉक्टरों की तैनाती नहीं की, तो वे आगामी 2027 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव का पूर्ण बहिष्कार करेंगे। इसके साथ ही गैरसैंण में होने वाले आगामी विधानसभा सत्र के घेराव की भी तैयारी की जा रही है।
प्रशासन का दावा
इस पूरे मामले पर स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. सुनीता टम्टा का कहना है कि सिमली अस्पताल को बेस अस्पताल का दर्जा दिया जा चुका है और स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। शेष बची हुई कागजी और प्रशासनिक प्रक्रियाएं पाइपलाइन में हैं। हालांकि, धरातल पर काम न दिखने के कारण ग्रामीण अब किसी भी मौखिक आश्वासन को मानने को तैयार नहीं हैं और लिखित शासनादेश पर अड़े हैं।

