डॉ. अखिलेश चन्द्र चमोला (वाचस्पती)
कलां निष्णात, स्वर्ण पदक प्राप्त,महामहिम राज्यपाल पुरस्कार एवं अंतरराष्ट्रीय शिक्षक सम्मान से सम्मानित की लेखनी से
उत्तराखंड की पावन धरा देव-संस्कृति के साथ-साथ उच्च कोटि के साहित्य, संगीत और लोक-चेतना की उद्गम स्थली रही है। इस माटी ने समय-समय पर ऐसे मनीषियों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपनी साधना से समाज को वैचारिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध किया है। इसी श्रृंखला में एक देदीप्यमान नक्षत्र के रूप में चमकता हुआ नाम है— आदरणीय श्री ओमप्रकाश सेमवाल जी।
रुद्रप्रयाग जनपद के ग्राम दरम्वाड़ी (जाखधार) की पवित्र माटी में जन्मे, स्वर्गीय श्रीमती कलावती देवी एवं स्वर्गीय श्री पीताम्बर दत्त सेमवाल जी के सुपुत्र श्री ओमप्रकाश सेमवाल जी बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भौतिकी जैसी गूढ़ विषय से एम.एस-सी. और बी.एड. करने के उपरांत, उन्होंने ज्ञान की अलख जगाई। वर्तमान में वे शहीद भरत सिंह राजकीय इंटर कॉलेज, मालतोली में प्रधानाचार्य के पद को सुशोभित कर रहे हैं और इसी गौरवमयी सेवापथ से 31 मई को सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं। उनका यह सेवाकाल केवल शासकीय दायित्वों का निर्वहन नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के चरित्र निर्माण का एक स्वर्णिम अध्याय रहा है।
गढ़वाली भाषा-साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर
सेमवाल जी का मूल परिचय उनकी मातृभाषा गढ़वाली के प्रति उनका अनन्य अनुराग है। वे केवल एक सजग रचनाकार नहीं, बल्कि गढ़वाली अस्मिता के रक्षक भी हैं। उनकी लेखनी ने समाज को झकझोरा भी है और आस्था के नए मार्ग भी दिखाए हैं।
प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ
कलसुड़ी भजन माला (2002): लोक-आस्था को सुरों में पिरोने का अनूठा प्रयास।
मेरि पूफु (2009) एवं ढुंगळा (2013): ये कथा संग्रह गढ़वाल के ग्रामीण जीवन, यहाँ के संघर्षों, संवेदनाओं और लोक-संस्कृति के जीवंत दस्तावेज हैं।
चुनौ (2020): इस नाट्य संग्रह के माध्यम से उन्होंने गढ़वाली रंगमंच को एक नई वैचारिक दिशा प्रदान की।
साहित्य के साथ-साथ उनकी सुरीली आवाज और आध्यात्मिक चेतना ने लोक-गायन को भी समृद्ध किया है। माँ फलासी चण्डिका, माँ हरियाली, बाबा तुंगनाथ, कोटेश्वर महादेव और माँ भुवनेश्वरी जैसी देव-शक्तियों पर आधारित उनके दर्जनों भजनों और ‘मैतै समळौण’ के गीतों ने उत्तराखंड के घर-घर में भक्तिरस का संचार किया है। आकाशवाणी (पौड़ी, देहरादून, नजीबाबाद) और दूरदर्शन उत्तराखंड के माध्यम से उनके गीत, कहानियाँ और साक्षात्कार निरंतर जनमानस को प्रेरित करते रहे हैं।
’कलश’ साहित्यिक संस्था: एक सांस्कृतिक आंदोलन
ओमप्रकाश सेमवाल जी के जीवन का एक अत्यंत विराट पक्ष ‘कलश साहित्यिक संस्था (ट्रस्ट)’ के संस्थापक के रूप में उनकी ऐतिहासिक भूमिका है। 23 मई 2004 को स्थापित इस संस्था ने उत्तराखंड में एक व्यापक साहित्यिक और सामाजिक क्रांति का रूप ले लिया है। इस मंच की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसने सांस्कृतिक चेतना को जगाने के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों को भी पूरी मजबूती से थामे रखा है।
अब तक 562 सफल कार्यक्रमों का विशाल कीर्तिमान स्थापित कर इस संस्था ने समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया है। एक ओर जहाँ संस्था ने लोक-संस्कृति को सहेजने के लिए 372 से अधिक भव्य कवि सम्मेलनों और 42 पुस्तकों के लोकार्पण का जिम्मा उठाया, वहीं दूसरी ओर सामाजिक दायित्वों को निभाते हुए निर्धन व मेधावी छात्र-छात्राओं की आर्थिक मदद और क्षेत्र की महान विभूतियों को सम्मान देने का अद्भुत कार्य भी किया।
संस्था की अविस्मरणीय उपलब्धियाँ
विभूतियों का स्मरण व सम्मान: हिमवंत कवि चन्द्र कुँवर बर्त्वाल, डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल, स्वामी सच्चिदानन्द, श्रीदेव सुमन और जिम कॉर्बेट जैसी महान विभूतियों की स्मृति में समारोह आयोजित कर वरिष्ठ साहित्यकारों व समाजसेवियों को सम्मानित करना ‘कलश’ की अनूठी परंपरा है।
कलश कवि सम्मेलन: वर्ष 2009 से अब तक गाँवों, शहरों और ऐतिहासिक मेलों में 372 से अधिक कवि सम्मेलनों का सफल संयोजन किया जा चुका है। इन सम्मेलनों की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महानायक श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी ने 30 बार इन मंचों की शोभा बढ़ाई है। पाण्डवाज क्रिएशन के साथ मिलकर वर्ष 2016, 2025 और 2026 में हुए तीन वृहद कवि सम्मेलन मील का पत्थर साबित हुए हैं।
गढ़वाली भाषा मानकीकरण: अप्रैल 2025 में देहरादून में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला, जिसमें 100 से अधिक दिग्गजों और नेगी जी की गरिमामयी उपस्थिति रही, मातृभाषा के संरक्षण की दिशा में सेमवाल जी का एक युगांतरकारी प्रयास था।
प्रकाशन कार्य: कलश के मंच से अब तक 42 पुस्तकों का लोकार्पण, दो दुर्लभ पुरानी पुस्तकों का पुनः प्रकाशन और तीन कलश स्मारिकाओं का संपादन-प्रकाशन हो चुका है।
परंपराओं का जीवंत रूप: समाज में समरसता और भाईचारा बढ़ाने के उद्देश्य से हर वर्ष बैठकी होली और होली मिलन समारोह का आयोजन इस संस्था की पहचान बन चुका है।
सम्मान एवं अलंकरण
उनकी इस अविराम साधना को समाज और सरकार ने भी मुक्त कंठ से सराहा है। उन्हें प्राप्त प्रमुख सम्मानों में शामिल हैं ।
- यूथ आइकॉन सम्मान, देहरादून
उफतारा सम्मान, देहरादून
उत्तरायणी सम्मान, दिल्ली
देवभूमि लोक सम्मान (हिमाद्रि फिल्म्स, दिल्ली द्वारा)
साहित्य सम्मान (गढ़वाल सांसद द्वारा रुद्रप्रयाग में प्रदत्त)
इसके अतिरिक्त उत्तराखंड के विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों द्वारा उन्हें 17 से अधिक बार विशेष रूप से सम्मानित किया जा चुका है।
एक नई पारी की शुरुआत
31 मई को प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद, ओमप्रकाश सेमवाल जी शासकीय बंधनों से मुक्त होकर पूरी तरह से माँ भारती और लोक-संस्कृति की सेवा में समर्पित होने जा रहे हैं। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती उर्मिला सेमवाल, पुत्रियाँ आकांक्षा व दिव्या और पुत्र कार्तिकेय उनके इस तपस्वी जीवन के संबल हैं।
एक शिक्षक और साहित्यकार के रूप में मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि सेमवाल जी जैसे मनीषी कभी ‘सेवानिवृत्त’ नहीं होते, बल्कि वे समाज के मार्गदर्शन के लिए और अधिक ‘प्रवृत्त’ हो जाते हैं। उनकी लेखनी, उनका गायन और ‘कलश’ के माध्यम से उनका यह अवदान युगों-युगों तक आने वाली पीढ़ी का पथ आलोकित करता रहेगा।
ईश्वर से प्रार्थना है कि वे दीर्घायु हों, ऊर्जावान रहें और उत्तराखंड के इस ‘सांस्कृतिक नक्षत्र’ की आभा निरंतर बढ़ती रहे।

