पुस्तक लोकार्पणकवियत्री मधुरवादिनी तिवारी के काव्य संग्रह 'वीणा मा दिख्याँ स्वीणा' का लोकार्पण

पुस्तक लोकार्पण : कवियत्री मधुरवादिनी तिवारी के काव्य संग्रह ‘वीणा मा दिख्याँ स्वीणा’ का लोकार्पण

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देहरादून : साहित्यिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन चुके दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सभागार में 1 जून 2026 को गढ़वाली भाषा की उदीयमान कवयित्री मधुर वादिनी तिवारी जी की काव्यकृति ‘वींणा मा देख्यॉं स्वीणा‘ का लोकार्पण हुआ। गढ़वाल विश्वविद्यालय के लोककला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र के निदेशक गणेश खुगशाल गणी जी की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार सोमवारी लाल उनियाल, मुख्य अतिथि, मैती आंदोलन के प्रणेता पद्म श्री कल्याण सिंह रावत जी, विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए।

मधुर वादिनी तिवारी जी की इस प्रथम काव्य कृति के विमोचन कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक रूप से अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन एवं चंडी प्रसाद तिवारी जी स्वस्तिवाचन के साथ हुआ। इसके उपरांत अपने मधुर कंठ के लिए विख्यात उखीमठ, रुद्रप्रयाग से कार्यक्रम में पहुंची लोक गायिका एवं कवयित्री कविता मैठाणी भट्ट ने मधुर वादिनी तिवारी जी की एक रचना ‘मायादार आंख्यू मा माया लुकाईं च… का सुंदर गायन प्रस्तुत कर लोकार्पित होने वाले इस काव्य संग्रह की एक बागनी प्रस्तुत की। इस रचना के गायन के बाद मंचासीन अतिथियों के द्वारा पुस्तक ‘वींणा मा देख्यॉं स्वींणा’ का विधिवत विमोचन किया गया। इस अवसर पर कवयित्री की माता जी की भी मंच पर उपस्थिति श्रद्धा एवं प्रेरणा के भाव से भरी हुई थी।

पुस्तक लोकार्पण के उपरांत गढ़वाली भाषा-साहित्य की गहन अध्येता एवं पुस्तक विवेचना व समीक्षा के लिए प्रख्यात विदुषी कवयित्री बीना बेंजवाल जी ने इस संग्रह पर अपनी बात रखी। श्रीमती बेंजवाल ने कहा कि यह पुस्तक मुख्य रूप से स्त्री विमर्श एवं स्त्री चेतना की कविताओं पर केंद्रित है। इस काव्य संग्रह की भूमिका लेखक कवयित्री कांता घिल्डियाल जी ने कहा कि मैंने और मधुर वादिनी जी ने अपनी साहित्य यात्रा साथ-साथ शुरू की और आज उनकी पुस्तक का लोकार्पण होते हुए देखना बहुत ही सुखद अनुभूति देता है। उन्होंने कहा कि इन रचनाओं में आए ठेट गढ़वाली शब्दों से साफ दिखाई देता है कि कवयित्री ने अपने गॉंव, अपनी थाती को नहीं छोड़ा।

पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में उपस्थित मधुर वादिनी जी के सुपुत्र विपुल तिवारी ने मॉं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि मॉं ने पूरे घर की जिम्मेदारी संभालने के साथ-साथ इस तरह का रचनाकर्म भी किया कि मेरी मॉं आज बड़े बड़े मंचों पर कविता पाठ करती हैं। ऐसी मॉं धन्य है। इस अवसर पर अपने विचार रखते हुए लेखिका ज्योत्सना जोशी ने कहा कि मधुर वादिनी तिवारी जी की कविताएं मुख्यत: स्त्री विमर्श एवं पहाड़ की नारी की संघर्ष की व्यथा हैं। वक्ताओं के क्रम में उपासना जी ने अपनी बात हिंदी मे रखी और कहा कि अकेला व्यक्ति महिला हो या पुरुष कुछ नही कर सकता यदि परिवार का सहयोग न मिले । इसलिए इस काव्य कृति के लिए मधुर वादिनी तिवारी जी के साथ-साथ उनके पति चंडी प्रसाद तिवारी जी भी बधाई के पात्र हैं, यदि इन रचनाओं में नारीवादी चिंतन है तो श्री तिवारी जी को भी नारीवादी चिंतक माना जाना चाहिए।

इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए कवयित्री के जमाता रजत पांडे जी ने भी अपनी भावनाएं व्यक्त की और कहा कि घर की जरूरतों को पूरा करते हुए इस तरह कविता लिखना और पुस्तक प्रकाशित करना सरल काम नहीं है। इसके लिए मैं रचनाकार को नमन करता हूँ। उनके कुमाउंनी में दिए गये व्यक्तव्य ने सभागार में रोचकता पैदा कर दी वहीं उनके मातृभाषा प्रेम को भी श्रोताओं ने काफी सराहा।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित पद्म श्री कल्याण सिंह रावत जी ने कहा कि समाज को बचाना है तो समाज की संस्कृति और प्रकृति दोनों को बचाना बहुत आवश्यक है। इस प्रकार की रचनाओं से हम संस्कृति एवं प्रकृति दोनों के प्रति चेतना जागृत कर सकते हैं।

पुस्तक लोकार्पण के इस कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती सुमित्रा जुगलान जी का भी मंच पर विशेष सानिध्य प्राप्त हुआ। उन्होंने अपने व्यक्तव में कहा कि मधुर वादिनी तिवारी जी का यह कार्य अति श्लाघनीय है। उन्होंने रचनाओं के माध्यम से विलुप्त होते गढ़वाली शब्दों को संरक्षित करने का भी प्रयास किया है जो बहुत प्रशंसनीय है।

इस आयोजन में मुख्य अतिथि की भूमिका में उपस्थित वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्य सेवी सोमवारी लाल उनियाल जी ने कहा कि इस कविता संग्रह का शीर्षक ही बहुत सुंदर है, जो यथार्थ के दर्शन कराने के साथ ही साथ जीवन में सकारात्मक उर्जा का भी संचार कर रहा है। उन्होंने कवयित्री को बधाई देते हुए निरन्तर लिखते रहने को कहा जिससे जीवन में सक्रियता बनी रहे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए गढ़वाल विश्वविद्यालय के लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र के निदेशक गणेश खुगशाल गणी ने कहा कि वे मधुर वादिनी तिवारी जी को भाषा कार्यशालाओं एवं संगोष्ठियों में लगातार प्रतिभाग करते हुए देखते आए हैं और इसी का परिणाम है कि आज उनकी रचनाओं में परिपक्वता दिखाई दे रही है। उन्होंने साथ ही अनुरोध किया कि हम विश्व की अन्य भाषाओं को सीखें परंतु अपनी मातृभाषा गढ़वाली को न छोड़ें। मातृभाषा की उपेक्षा आने वाले समय में हमें भाषाई तौर पर विपन्न बना देगी।

लगभग 2 घंटे चले इस गरिमामयी कार्यक्रम में दून लाइब्रेरी में रिसर्च एसोशियेट चंद्र शेखर तिवारी, शिक्षा विभाग में उच्च अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त शिव प्रसाद सेमवाल, बेलीराम कंसवाल, बलबीर राणा अडिग, स्नेहलता डंगवाल, इंदु डंगवाल, युद्धवीर नेगी, विनोद बडोनी, आलोक डंगवाल, विनोद बडोनी, प्रदीप कोठियाल, मदन मोहन डुकलाण, नंदन राणा नवल, रमाकांत बेंजवाल, शांति प्रकाश जिज्ञासू, डॉ सुनील थपलियाल, डॉ शैलेंद्र मैठाणी, अनिल नेगी, सुंदर बिष्ट, विनीता मैठाणी, रिद्धि भट्ट, अंजना कंडवाल प्रेमलता सजवाण, बीना कंडारी, अरविंद प्रकृति प्रेमी, मनोज इष्टवाल, मदन मोहन कंडवाल आदि साहित्यकार, पत्रकार एवं बुद्धिजीवी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन साहित्य के गहन अध्येता मृदुभाषी शिक्षक एवं सफल मंच संचालक गिरीश बडोनी जी ने किया।

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