उत्तराखंडी फीचर फ़िल्म मंगलउत्तराखंडी फीचर फ़िल्म मंगल में पहाड़ी युवक के किरदार में देवा धामी के सहज और प्रभावी अभिनय ने दर्शकों पर छोड़ी गहरी छाप

राजू बोहरा / वरिष्ठ फ़िल्म संवाददाता

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पारंपरिक लोकजीवन और मानवीय मूल्य

  • उत्तराखंडी फीचर फ़िल्म ‘मंगल’ की सफलता
  • देवा धामी का सहज और प्रभावी अभिनय
  • पारंपरिक लोकजीवन और मानवीय मूल्य

नई दिल्ली : उत्तराखंडी फीचर फिल्म मंगल 21 अगस्त को उत्तराखंड के सिनेमाघरों में रिलीज होने के बाद दर्शकों से अच्छी प्रतिक्रिया हासिल कर रही है। फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह मनोरंजन के साथ उत्तराखंड की पारंपरिक संस्कृति, लोकजीवन, रीति-रिवाजों, भाषा और मानवीय मूल्यों को बड़े पर्दे पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है।

उत्तराखंडी फीचर फ़िल्म ‘मंगल’ में देवा धामी और अंकिता परिहार का अभिन


इस उत्तराखंडी फीचर फ़िल्म ‘मंगल’ के मुख्य अभिनेता देवा धामी ने पहाड़ी युवक के किरदार को बेहद सहज और स्वाभाविक अंदाज में निभाया है। उनके अभिनय में पहाड़ के युवा की सादगी, संवेदनशीलता और अपनी जड़ों से जुड़ाव साफ दिखाई देता है। वहीं अभिनेत्री अंकिता परिहार ने भी अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया है।

उत्तराखंडी फीचर फ़िल्म ‘मंगल’ की कहानी और खासियत


दर्शकों को उत्तराखंडी फीचर मंगल की कहानी में उत्तराखंड के पारंपरिक जीवन और संस्कृति की झलक प्रमुखता से दिखाई देती है। पहाड़ की बोली, परंपराएं, सामाजिक रिश्ते और लोकजीवन फिल्म को स्थानीय रंग देने के साथ दर्शकों को अपनी संस्कृति और जड़ों से जोड़ते हैं। यही वजह है कि फिल्म को परिवार के साथ देखने योग्य बताया जा रहा है।


फिल्म मंगल के निर्देशन, संगीत और छायांकन की भी सराहना हो रही है। उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता और पारंपरिक परिवेश को कैमरे के माध्यम से आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। दर्शकों का मानना है कि आज के दौर में अपनी माटी, भाषा और संस्कृति को केंद्र में रखकर बनने वाली फिल्मों की विशेष आवश्यकता है।


फिलहाल ‘उत्तराखंडी फीचर फिल्म मंगल का पहला चरण उत्तराखंड में उत्साहजनक प्रतिक्रिया के साथ चल रहा है। अब फिल्म को दिल्ली, मुंबई, जयपुर सहित अन्य शहरों में प्रदर्शित करने की तैयारी है। मंगल उत्तराखंड की पारंपरिक संस्कृति और पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में सामने आ रही है।

पलायन और क्षेत्रीय सिनेमा की नई उम्मीद

क्षेत्रीय सिनेमा के इतिहास में उत्तराखंडी फीचर फिल्म मंगल को एक मील का पत्थर माना जा रहा है। फिल्म न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि पहाड़ के उस दर्द को भी बयां करती है जिससे यहां का हर परिवार जूझ रहा है—वह है ‘पलायन’। निर्देशक ने बहुत ही संजीदगी के साथ इस गंभीर मुद्दे को कहानी के ताने-बाने में पिरोया है।

देवा धामी का किरदार एक ऐसे युवक का है जो आधुनिकता की चकाचौंध के बीच भी अपनी माटी को नहीं छोड़ना चाहता। उनका यह संघर्ष सिनेमाघरों में बैठे हर पहाड़ी दर्शक के दिल को छू जाता है। फिल्म देखने के बाद कई दर्शकों ने भावुक होकर कहा कि यह फिल्म सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि उत्तराखंड के हर घर की हकीकत है।

संगीत और लोक धुनों का जादुई संगम

फिल्म की एक और सबसे बड़ी ताकत इसका कर्णप्रिय संगीत है। उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्रों और लोक धुनों का आधुनिक संगीत के साथ जो मिश्रण तैयार किया गया है, वह अद्भुत है। उत्तराखंडी फीचर फिल्म मंगल के गीत दर्शकों की जुबान पर चढ़ चुके हैं। चाहे वह कोई मांगलिक गीत हो या पहाड़ की वादियों को दर्शाता कोई सुरीला तराना, हर एक ट्रैक कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करता है।

संगीतकारों ने उत्तराखंड की लोक विरासत को अक्षुण्ण रखते हुए इसे आज की युवा पीढ़ी के स्वाद के अनुसार पेश किया है, जो इस फिल्म की सफलता का एक मुख्य कारण बनकर उभरा है।

तकनीकी पक्ष और छायांकन का बेहतरीन स्तर

तकनीकी रूप से भी उत्तराखंडी फीचर फिल्म मंगल‘ ने उत्तराखंडी सिनेमा के स्तर को काफी ऊंचा उठाया है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी (छायांकन) इतनी लाजवाब है कि उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ों, हरे-भरे खेतों, बहती नदियों और पारंपरिक काष्ठकला से बने घरों को बड़े पर्दे पर देखना एक जादुई अहसास कराता है। लाइटिंग और फ्रेमिंग पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिससे हर एक दृश्य जीवंत प्रतीत होता है। फिल्म का संपादन (एडिटिंग) भी काफी कसा हुआ है, जो दर्शकों को पूरी फिल्म के दौरान बांधे रखता है और कहीं भी कहानी की गति को धीमा नहीं होने देता।

सह-कलाकारों का अभिनय और मजबूत निर्देशन

देवा धामी और अंकिता परिहार के अलावा उत्तराखंडी फीचर फिल्म मंगल के अन्य सह-कलाकारों ने भी अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है। बुजुर्ग माता-पिता और ग्रामीण परिवेश के अन्य पात्रों में स्थानीय कलाकारों का चयन फिल्म को एक प्रामाणिक रूप देता है।

निर्देशक ने हर एक कलाकार से उनकी क्षमता के अनुरूप सर्वश्रेष्ठ काम लिया है। फिल्म का स्क्रीनप्ले (पटकथा) और संवाद इतने सशक्त हैं कि वे दर्शकों को हंसाते भी हैं और कई मौकों पर आंखें नम करने के लिए भी मजबूर कर देते हैं। गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा के सुंदर पुट ने संवादों को और अधिक सुरीला और प्रभावी बना दिया है।

राष्ट्रीय स्तर पर रिलीज की भारी मांग

उत्तराखंड में मिल रही अपार सफलता के बाद, देश के विभिन्न महानगरों में रह रहे प्रवासी उत्तराखंडी समुदाय के बीच इस उत्तराखंडी फीचर फिल्म मंगल को लेकर भारी उत्सुकता देखी जा रही है। दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, चंडीगढ़, जयपुर और लखनऊ जैसे शहरों में रहने वाले प्रवासी संगठन लगातार फिल्म के निर्माताओं से संपर्क कर रहे हैं ताकि उनके शहरों में भी इसके शो आयोजित किए जा सकें

वितरकों का मानना है कि ‘मंगल’ में वह क्षमता है जो दक्षिण भारतीय या अन्य क्षेत्रीय सिनेमा की तरह अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सके। यह फिल्म निश्चित रूप से आने वाले समय में उत्तराखंडी सिनेमा के लिए नए दरवाजे खोलेगी।