उत्तराखंड के महान दानवीर स्वर्गीय ठाकुर वीर सिंह कंदारी जी की तस्वीर, जिन्हें 'हेलीकॉप्टर वाले दानवीर' और गढ़वाल का भामाशाह कहा जाता हैहेलीकॉप्टर वाले दानवीर': लाहौर से दिल्ली तक का सफर, करोड़ों कमाए पर अपनों के लिए फूटी कौड़ी न रखने वाले गढ़वाल के 'भामाशाह' की अनकही दास्तान

हेलीकॉप्टर वाले दानवीर: लाहौर से दिल्ली तक का सफर, करोड़ों कमाए पर अपनों के लिए फूटी कौड़ी न रखने वाले गढ़वाल के ‘भामाशाह’ की अनकही दास्तान

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नई दिल्ली : आज की दुनिया का दस्तूर बड़ा बेढंगा, मगरूर और स्वार्थी हो चुका है। यहां इंसान की कीमत उसकी इंसानियत से नहीं, बल्कि उसकी गाड़ियों, बंगलों, बैंक बैलेंस और राजनीतिक रुतबे से आंकी जाती है। यह समाज कितनी जल्दी अपने असली नायकों को भुला देता है, इसका सबसे बड़ा और जीवंत उदाहरण हैं— स्वर्गीय ठाकुर वीर सिंह कंडारी जी। वही महापुरुष, जिन्होंने दिल्ली में ‘गढ़वाल पनीर भंडार’ साम्राज्य खड़ा किया, लेकिन अपनी करोड़ों की कमाई पहाड़ों के पर्यावरण, बेजुबान जानवरों, गरीबों और बच्चों के भविष्य को संवारने में फूटी कौड़ी छोड़े बिना न्यौछावर कर दी।

पहाड़ का एक ऐसा स्वाभिमानी गढ़वाली, जिसने दौलत तो अथाक कमाई, लेकिन जब दुनिया से विदा ली, तो खामोशी की चादर ओढ़ ली और अपने पीछे संपत्ति का कोई मोह नहीं छोड़ा। उत्तराखंड के सबसे कद्दावर राजनेता, जिन्होंने देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक को हिलाकर रख दिया था, वे स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा जी भी ठाकुर वीर सिंह कंडारी जी के सामने नतमस्तक रहते थे और उन्हें गढ़वाल का ‘महान दानवीर’ कहकर सम्मानित करते थे।

11 साल की उम्र में घर से भागे, अखाड़े के पहलवान से बने ‘पनीर किंग’

वीर सिंह कंडारी जी के जीवन का शुरुआती सफर किसी फिल्मी कहानी जैसा रोमांचक और संघर्षों से भरा था। गुलाम भारत के दौर में, पहाड़ के एक बेहद गरीब परिवार में जन्मे वीर सिंह बचपन में जंगलों में पशु (गोरु) चराने जाया करते थे। एक दिन जंगल में एक बाघ ने उनकी गाय के बछड़े को मार दिया। पिता की मार और गुस्से के डर से 11 साल का वह मासूम बालक ऐसा डरा कि जंगल से ही भाग खड़ा हुआ। भटकते-भटकते वह बालक उस समय के अविभाजित भारत के लाहौर (अब पाकिस्तान) जा पहुंचा। वहां जीवन के कड़े संघर्षों को झेला, अपनी कद-काठी को मजबूत किया और अखाड़े में उतरकर कई कुश्तियां लड़कर बड़े-बड़े पहलवानों को चित किया। देश के विभाजन के बाद वे वापस दिल्ली आए। पुरानी दिल्ली के फतेहपुरी की गांधी गली में मात्र 4×4 फीट की दुकान से दूध और पनीर का व्यापार शुरू किया। अपनी ईमानदारी और शुद्धता के दम पर वे देखते ही देखते उत्तर भारत में दूध और पनीर के सबसे बड़े व्यवसायी बन गए, और आकाशवाणी के विविध भारती पर गूंजने लगा-जम्बूरे बतायेगा गढ़वाल पनीर भंडार…”।

करोड़ों की कमाई और पहाड़ के लिए असीम त्याग

जैसे ही कंदारी जी के पास लक्ष्मी जी की कृपा हुई, उन्होंने अपनी पूरी ताकत और कमाई अपने पहाड़ के विकास में झोंक दी। उनका लक्ष्य अपने लिए महल बनाना नहीं था, बल्कि

जल और जीव संरक्षण: उन्होंने पहाड़ों में जंगलों के भीतर पारंपरिक ‘चाल-खाल’ (तालाब) बनवाए। बेजुबान जंगली जानवरों के लिए जंगलों में हजारों किलो सेंधा नमक के बड़े-बड़े टुकड़े रखवाए ताकि वे अपनी जरूरत पूरी कर सकें। नदियों में मछलियों के लिए विशेष तालाब बनवाए।

शिक्षा के मसीहा: गढ़वाल और कुमाऊं के सैकड़ों स्कूलों की इमारतों के लिए उन्होंने अपनी जेब से पैसे दान दिए। गरीब बच्चों के लिए किताबें, कपड़े, स्कूल ड्रेस और खेल सामग्री की व्यवस्था की। जो बच्चा पढ़ाई में अव्वल आता था, उसे प्रोत्साहित करने के लिए वे अपने खर्चे पर हेलीकॉप्टर की सैर करवाते थे, जो उस दौर में एक अकल्पनीय बात थी।

सामाजिक सुधार और सादगी: पहाड़ को शराब के दलदल से निकालने के लिए उन्होंने बाकायदा एक वर्दीधारी फोर्स (‘सेवा समिति’) बनाई। अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में वे इतने कड़े आदर्शों के मालिक थे कि अपने बेटे की शादी में न तो शराब परोसी और न ही कोई दिखावा किया। दहेज के नाम पर उन्होंने सिर्फ शगुन का ‘एक रुपया’ स्वीकार किया।


क्यों भूल गई यह कमबख्त दुनिया? (एक कड़वा यक्ष प्रश्न)

आज दिल्ली-एनसीआर में कंडारी जी के नाम पर सैकड़ों फर्जी ‘गढ़वाल पनीर भंडार’ खुल चुके हैं, जो उनके नाम की साख को भुना रहे हैं। लेकिन क्या कोई उस महान आत्मा को याद कर रहा है? आज का समाज कंडारी जी को इसलिए भूल गया क्योंकि:

  1. उन्होंने बड़े शहरों में अपने और अपने परिवार के लिए बड़ी-बड़ी कोठियां और संपत्तियां नहीं बटोरीं।
  2. उन्होंने अपने पैसों का भद्दा प्रदर्शन या दिखावा नहीं किया।
  3. उन्होंने अपनी करोड़ों की दौलत इंसानों, पर्यावरण और जीव-जंतुओं की निस्वार्थ सेवा में उड़ा दी।
  4. जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने किसी सुख-सुविधा की चाह नहीं रखी और बेहद खामोशी व फकीरी की जिंदगी जी।

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी के बाद अगर किसी गढ़वाली ने देश की राजधानी में उत्तराखंड का नाम पूरी ठसक और स्वाभिमान के साथ ऊंचा किया था, तो वह ठाकुर वीर सिंह कंडारी जी ही थे। आज भले ही स्वार्थी दुनिया उन्हें याद न करे, लेकिन पहाड़ की नदियां, जंगल, चाल-खाल और उन स्कूलों की दीवारें हमेशा उनकी दानवीरता की गवाही देंगी। ऐसे निस्वार्थ कर्मयोगी, सच्चे गौ-सेवक और पर्यावरणविद स्वर्गीय ठाकुर वीर सिंह कंदारी जी को हमारा कोटि-कोटि नमन। यह खबर उनके उसी महान और त्यागमय जीवन को एक सच्ची और भावभीनी श्रद्धांजलि है।

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